प्रसार भारती को मिला नया नेतृत्व: गीतकार-रचनाकार प्रसून जोशी बने अध्यक्ष

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डिजिटल बदलाव के दौर में प्रसार भारती के लिए निर्णायक मोड़

NEWS1UP

साहित्यिक डेस्क

नई दिल्ली। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने देश के सार्वजनिक सेवा प्रसारक प्रसार भारती के अध्यक्ष पद पर प्रख्यात गीतकार, लेखक और संचार विशेषज्ञ प्रसून जोशी की नियुक्ति की घोषणा की है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब प्रसारण जगत तेजी से डिजिटल और दर्शक-केंद्रित बदलावों के दौर से गुजर रहा है।

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस नियुक्ति का स्वागत करते हुए कहा कि जोशी एक विलक्षण रचनात्मक शक्ति हैं, जिनका काम भारत की सांस्कृतिक आत्मा को प्रतिबिंबित करता है। उन्होंने भरोसा जताया कि जोशी के नेतृत्व में प्रसार भारती को नई ऊर्जा, स्पष्ट दृष्टि और एक सशक्त रचनात्मक दिशा मिलेगी।

अनुभव और रचनात्मक पृष्ठभूमि

प्रसून जोशी का करियर साहित्य, सिनेमा और विज्ञापन की दुनिया में बेहद समृद्ध रहा है। वे 2017 से केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे हैं, जहां उन्होंने रचनात्मक स्वतंत्रता और नियामक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया।

विज्ञापन जगत में भी उन्होंने अहम भूमिकाएँ निभाई हैं, जिनमें McCann Worldgroup India के सीईओ और एशिया पैसिफिक क्षेत्र के अध्यक्ष जैसे पद शामिल हैं। इसके अलावा वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के न्यासी के रूप में भी जुड़े रहे हैं।

प्रसार भारती के सामने चुनौतियाँ

प्रसार भारती की स्थापना प्रसार भारती अधिनियम 1990 के तहत हुई थी और 1997 से यह स्वायत्त सार्वजनिक प्रसारक के रूप में कार्य कर रहा है। इसके अंतर्गत अखिल भारतीय रेडियो और दूरदर्शन का संचालन होता है।

आज के दौर में, जब निजी मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म और डिजिटल कंटेंट तेजी से विस्तार कर रहे हैं, प्रसार भारती के सामने अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जोशी की रचनात्मक समझ और संचार कौशल इस संस्थान को नई दिशा दे सकते हैं, खासतौर पर युवाओं को जोड़ने, क्षेत्रीय कंटेंट को बढ़ावा देने और डिजिटल विस्तार को मजबूत करने में।

हालांकि इस नियुक्ति का व्यापक स्वागत हुआ है, लेकिन कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। क्या रचनात्मक पृष्ठभूमि रखने वाले जोशी प्रशासनिक और नीतिगत चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर पाएंगे ? क्या वे सरकारी प्रसारक की स्वायत्तता और निष्पक्षता को और मजबूत कर सकेंगे ?

इसके साथ ही, यह भी देखने वाली बात होगी कि वे तेजी से बदलती मीडिया खपत की आदतों के बीच प्रसार भारती को किस तरह प्रतिस्पर्धी और प्रासंगिक बनाए रखते हैं।

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