अब तारीख नहीं, कब्ज़ा तय करेगा अपराध!

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दिल्ली हाई कोर्ट का सख्त संदेश

काली कमाई से खरीदी संपत्ति पर बना रहेगा कानून का शिकंजा

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली। मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ कानूनी कार्रवाई को नई धार देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि अपराध की कमाई से खरीदी गई संपत्ति पर मौजूदा कब्ज़ा ही अपराध को जिंदा रखता है। अदालत ने कहा कि अब यह मायने नहीं रखता कि संपत्ति कब खरीदी गई, असली सवाल यह है कि आज उस पर कब्ज़ा किसका है और उससे लाभ कौन उठा रहा है।

 Continuing Offence’ की नई व्याख्या

कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग को “निरंतर जारी रहने वाला अपराध” (Continuing Offence) मानते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपराध से अर्जित संपत्ति को अपने पास रखता है, उसका उपयोग करता है या उससे लाभ कमाता है, तो वह हर दिन कानून का उल्लंघन करता है।

इस व्याख्या ने उन सभी दलीलों को खारिज कर दिया है, जिनमें आरोपी यह कहते थे कि संपत्ति कानून लागू होने से पहले खरीदी गई थी, इसलिए उन पर कार्रवाई नहीं हो सकती।

वसंत विहार की प्रॉपर्टी बना केंद्र

पूरा मामला दक्षिण दिल्ली के वसंत विहार स्थित एक रिहायशी संपत्ति से जुड़ा है, जिसे मार्च 2005 में खरीदा गया था। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह संपत्ति कथित तौर पर नेशनल एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया से जुड़े घोटाले की रकम से खरीदी गई थी। आरोप है कि कच्ची चीनी के आयात और बिक्री में गड़बड़ी कर संगठन को आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया और लगभग 1.5 करोड़ रुपये संदिग्ध कंपनियों के माध्यम से घुमाकर इस प्रॉपर्टी में लगाए गए।

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ED की कार्रवाई पर मुहर

प्रवर्तन निदेशालय ने जनवरी 2014 में इस संपत्ति को मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत अस्थायी रूप से अटैच किया था। एजेंसी का दावा था कि यह ‘अपराध से प्राप्त आय’ (Proceeds of Crime) है। हालांकि, पहले एकल न्यायाधीश ने यह कहते हुए राहत दी थी कि कथित मनी लॉन्ड्रिंग की प्रक्रिया कानून लागू होने से पहले समाप्त हो चुकी थी।

लेकिन डिवीजन बेंच ने इस निर्णय को पलटते हुए कहा- 

“अपराध की कमाई केवल नकदी तक सीमित नहीं है, उससे खरीदी गई संपत्तियां भी उसी श्रेणी में आती हैं।”

पुरानी खरीद’ का तर्क हुआ खत्म

कोर्ट ने साफ कर दिया कि संपत्ति भले ही वर्षों पहले खरीदी गई हो लेकिन यदि वह आज भी आरोपी के कब्ज़े या उपयोग में है, तो उसे मनी लॉन्ड्रिंग का हिस्सा माना जाएगा। इस प्रकार अदालत ने “समय-सीमा” के बजाय “वर्तमान उपयोग” को अपराध का आधार बना दिया।

फैसले का व्यापक असर

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस निर्णय के दूरगामी परिणाम होंगे। पुराने आर्थिक अपराधों की फाइलें फिर खुल सकती हैं। बेनामी और शेल कंपनियों के जरिए खरीदी गई संपत्तियों पर कार्रवाई तेज होगी। अब जांच एजेंसियों को मामलों में लंबी अवधि तक हस्तक्षेप का अधिकार मिलेगा।

इस फैसले के जरिए अदालत ने एक स्पष्ट संदेश दिया है अपराध से अर्जित संपत्ति केवल अतीत की गलती नहीं, वर्तमान का अपराध है।

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