वोट डालने का हक नहीं, फिर कैसे बने AOA अध्यक्ष ? महागुनपुरम विवाद ने खोली सोसाइटी चुनावों की परतें

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20 मई को डिप्टी रजिस्ट्रार के सामने होगी पेशी

NEWS1UP

एओए/आरडब्ल्यूए डेस्क

गाजियाबाद। एनएच-24 स्थित महागुनपुरम सोसायटी का AOA चुनाव अब एक बड़े कानूनी और प्रशासनिक विवाद में बदल चुका है। मामला सीधे उस बुनियादी सवाल पर आकर टिक गया है, जिसे लेकर पूरी सोसायटी में चर्चा तेज है कि जब किसी व्यक्ति को नियमों के अनुसार वोट डालने तक का अधिकार नहीं था, तो वह आखिर AOA अध्यक्ष कैसे बन गया ?

इसी विवाद पर अब डिप्टी रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसायटीज एवं चिट्स ने सख्त रुख अपनाते हुए महागुनपुरम AOA के अध्यक्ष और सचिव को 20 मई को कार्यालय में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।

फर्स्ट ओनर नहीं, फिर भी चुनाव लड़ने का आरोप

पूरा मामला 11 जनवरी 2026 को हुए AOA चुनाव से जुड़ा है। आरोप है कि प्रसून श्रीवास्तव “फर्स्ट ओनर” नहीं होने के बावजूद चुनाव मैदान में उतरे और अध्यक्ष पद तक पहुंच गए। जबकि मॉडल बायलॉज-2011 साफ कहता है कि केवल “फर्स्ट ओनर” को ही वोट डालने का अधिकार प्राप्त है। यानी नियमों के हिसाब से यदि कोई व्यक्ति वोट डालने के योग्य नहीं है, तो वह चुनाव लड़ ही नहीं सकता।

यही वजह है कि अब सवाल केवल चुनावी प्रक्रिया पर नहीं, बल्कि पूरे चुनाव की वैधता पर उठ रहे हैं।

डिप्टी रजिस्ट्रार के नोटिस में नियम उल्लंघन का उल्लेख

डिप्टी रजिस्ट्रार द्वारा जारी नोटिस में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि चुनाव प्रक्रिया में “यू.पी. अपार्टमेंट एक्ट-2010” तथा “मॉडल बायलॉज-2011” की धारा 5(3)(क) और 3(ख) के उल्लंघन की शिकायत प्राप्त हुई है। नोटिस में यह भी उल्लेख है कि धारा 58 के तहत आवश्यक सहमति लिए बिना चुनाव प्रक्रिया पूरी की गई तथा को-ऑनर को चुनाव में शामिल कर नियमों की अनदेखी की गई।

मतदाता सूची पर भी घमासान

मामले को और गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि प्रसून श्रीवास्तव पिछले दो कार्यकाल में AOA के कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। आरोप है कि मतदाता सूची उनकी देखरेख में तैयार हुई और उसी दौरान कथित तौर पर उनका नाम “फर्स्ट ओनर” के रूप में दर्ज कर दिया गया।

यदि जांच में यह आरोप सही पाए गए, तो मामला केवल नियम उल्लंघन का नहीं बल्कि चुनावी रिकॉर्ड में कथित हेरफेर का भी बन सकता है।

शिकायतों से शुरू हुआ विवाद, अब सुनवाई पर टिकी निगाहें

सोसायटी निवासी पौरुष चौधरी एवं अन्य निवासियों ने 9 मार्च को डिप्टी रजिस्ट्रार और जिलाधिकारी को शिकायत भेजकर चुनाव प्रक्रिया को चुनौती दी थी। इसके पहले निर्वाचन समिति ने भी 8 मार्च को अलग से शिकायत दर्ज कराई। 20 मार्च को सिटी मजिस्ट्रेट ने भी डीआर को पत्र के माध्यम से जांच के लिए कहा। 

AOA की ओर से 6 अप्रैल को जवाब दाखिल किया गया, लेकिन शिकायतकर्ताओं ने उसे असंतोषजनक बताते हुए 22 अप्रैल को फिर आपत्ति दर्ज करा दी। अब 20 मई को दोनों पक्षों को सुनवाई के लिए बुलाया गया है।

नियम लागू हुए तो कुर्सी बचना मुश्किल

सोसायटी मामलों के जानकारों का कहना है कि प्रशासन की निगरानी में हुए सभी AOA चुनावों में सेकेंड ओनर को न मतदान की अनुमति दी गई और न चुनाव लड़ने का अधिकार मिला। ऐसे में यदि मॉडल बायलॉज और अपार्टमेंट एक्ट के प्रावधानों को सख्ती से लागू किया गया, तो प्रसून श्रीवास्तव की कुर्सी जाना तय माना जा रहा है।

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