यूपी में पंचायत चुनाव की उलटी गिनती शुरू ! ओबीसी आयोग पर योगी कैबिनेट की मुहर

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ओबीसी आरक्षण तय करेगा नया आयोग

NEWS1UP

भूमेश शर्मा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आगामी पंचायत चुनावों से पहले योगी सरकार ने बड़ा और राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए ग्रामीण निकायों में ओबीसी आरक्षण के निर्धारण के लिए “उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग” के गठन को मंजूरी दे दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में लोकभवन में हुई कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव पर मुहर लगी। सरकार का दावा है कि यह निर्णय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में लिया गया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे पंचायत चुनावों से पहले पिछड़ा वर्ग को साधने की बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह मानी जा रही है कि समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को हरी झंडी मिलने के साथ ही अब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का रास्ता लगभग साफ हो गया है। दरअसल, पंचायत चुनाव की प्रक्रिया में ओबीसी आरक्षण को लेकर कानूनी और प्रशासनिक स्थिति सबसे बड़ी बाधा मानी जा रही थी। अब सरकार द्वारा आयोग गठित किए जाने के बाद यह अड़चन समाप्त होती दिखाई दे रही है। राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में माना जा रहा है कि आयोग की रिपोर्ट आने के बाद पंचायत चुनाव कार्यक्रम घोषित करने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।

गौरतलब है कि वर्ष 2021 के पंचायत चुनावों के परिणाम 2 मई को घोषित कर दिए गए थे। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार इस बार भी समयबद्ध तरीके से चुनाव कराने की तैयारी में जुट गई है। आयोग के गठन को चुनावी प्रक्रिया की निर्णायक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

प्रदेश सरकार द्वारा गठित यह आयोग पंचायतों में ओबीसी वर्ग के सामाजिक, राजनीतिक और प्रतिनिधित्व संबंधी वास्तविक आंकड़ों का समकालीन एवं अनुभवजन्य अध्ययन करेगा। आयोग यह तय करेगा कि किस निकाय में ओबीसी वर्ग को कितना आरक्षण दिया जाना चाहिए। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही आगामी पंचायत चुनावों में आरक्षण का अंतिम स्वरूप तय होगा।

छह महीने में रिपोर्ट, पंचायत चुनावों की दिशा तय करेगी सिफारिशें

कैबिनेट में लिए गए फैसलों की जानकारी देते वित्त मंत्री सुरेश खन्ना

सरकार के अनुसार आयोग का कार्यकाल सामान्य रूप से छह माह का होगा। इस दौरान आयोग ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत स्तर पर ओबीसी वर्ग की स्थिति, भागीदारी और जनसंख्या के आंकड़ों का अध्ययन करेगा। यदि अद्यतन आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे तो आयोग सर्वेक्षण कराकर डेटा तैयार करेगा। इसके बाद निकायवार आनुपातिक आरक्षण की संस्तुति सरकार को सौंपी जाएगी।

वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने कैबिनेट फैसलों की जानकारी देते हुए कहा कि सरकार ने उच्चतम न्यायालय के आदेशों का पालन करते हुए यह कदम उठाया है ताकि पंचायत चुनावों में आरक्षण प्रक्रिया कानूनी कसौटी पर पूरी तरह टिक सके।

हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज होंगे अध्यक्ष

सरकार द्वारा गठित यह आयोग पांच सदस्यीय होगा। इसमें उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अध्यक्ष बनाया जाएगा, जबकि अन्य सदस्यों में पिछड़ा वर्ग मामलों की समझ और अनुभव रखने वाले विशेषज्ञ शामिल किए जाएंगे। आयोग को संवैधानिक प्रावधानों और आरक्षण व्यवस्था के व्यावहारिक पहलुओं का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करनी होगी।

27 प्रतिशत की सीमा बरकरार

सरकार ने स्पष्ट किया है कि पंचायतों में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण कुल सीटों के 27 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम 1947 तथा उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम 1961 के तहत लागू रहेगी। संविधान के अनुच्छेद 243-घ के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों को पंचायतों में आरक्षण देने का प्रावधान है।

पंचायत राजनीति में बढ़ेगी हलचल

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि पंचायत चुनावों से पहले सामाजिक समीकरणों को साधने की बड़ी कवायद भी है। आयोग की रिपोर्ट आने के बाद कई जिलों और पंचायतों में आरक्षण का पूरा गणित बदल सकता है। इससे स्थानीय स्तर पर नई राजनीतिक रणनीतियां बनना तय माना जा रहा है। साथ ही अब जब पंचायत चुनाव के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा दूर होती दिख रही है, तो संभावित उम्मीदवारों और स्थानीय राजनीतिक समूहों ने भी अपनी सक्रियता बढ़ानी शुरू कर दी है।

कैबिनेट में 12 प्रस्तावों को मंजूरी

लोकभवन में आयोजित कैबिनेट बैठक में कुल 12 प्रस्ताव प्रस्तुत किए गए और सभी को मंजूरी दे दी गई। हालांकि सबसे अधिक चर्चा ओबीसी आरक्षण आयोग के गठन को लेकर रही, क्योंकि इसका सीधा असर प्रदेश की पंचायत राजनीति और लाखों जनप्रतिनिधियों के भविष्य पर पड़ने वाला है।

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