पराली को बदनाम किया गया ? जहरीली हवा का असली मास्टरमाइंड जानें…
दिल्ली के 22 एयर स्टेशन में 30+ दिन
कार्बन मोनोऑक्साइड सीमा से ऊपर
खतरे की घंटी नहीं, सायरन है
NEWS1UP
विशेष संवाददाता
नई दिल्ली। देश की राजधानी ही नहीं बल्कि नोएडा, गाजियाबाद सहित पूरे एनसीआर की सर्द सुबहें अब रोमांच नहीं, डर लेकर आती हैं। शहर की फिज़ा में घुला धुआं और धुंध मिलकर ऐसा ज़हरीला घेरा बना रहे हैं कि हर सांस मानो फेफड़ों पर एक नया बोझ लाद दे। दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि इस बार पराली जलने की घटनाएं कई सालों में सबसे कम रहीं, इसके बावजूद दिल्ली-एनसीआर की हवा पहले से ज़्यादा दमघोंटू हो चुकी है।
सांसों में जहर: राजधानी का बढ़ता संकट
सुबह 6 बजे का औसत AQI 331 दर्ज किया गया, यानी ‘बहुत खराब’ श्रेणी। जहां गंगटोक सुकून भरी 35 AQI वाली हवा में सांस ले रहा है, वहीं दिल्ली का स्तर 11 गुना अधिक प्रदूषित है। अक्टूबर–नवंबर में पूरा मौसम ‘बेहद खराब’ से लेकर ‘गंभीर’ श्रेणी में झूलता रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि इस जहरीली हवा का कारण स्थानीय स्तर पर बढ़ रहे ये प्रदूषक हैं-
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PM 2.5
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NO₂ (नाइट्रोजन डाइऑक्साइड)
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CO (कार्बन मोनोऑक्साइड)
लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, दिल के रोग और सांस की बीमारियां खतरनाक स्तर तक बढ़ सकती हैं।

ऑपरेशन क्लीन एयर: जमीनी हकीकत उजागर
सीएक्यूएम (CAQM) द्वारा ‘ऑपरेशन क्लीन एयर’ के तहत दिल्ली की 321 सड़कों का निरीक्षण किया गया। उद्देश्य था, धूल के स्तर का आकलन और सफाई व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को समझना।
निरीक्षण के नतीजे चौंकाने वाले रहे-
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35 मार्गों पर धूल का स्तर बहुत अधिक
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61 मार्गों पर मध्यम
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94 मार्गों पर कम
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131 मार्गों पर धूल नहीं
इन आंकड़ों ने फिर साफ कर दिया कि सड़कों की धूल दिल्ली के सर्दियों वाले प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। नियमित यांत्रिक सफाई, धूल हटाना, फुटपाथों का रखरखाव, और पानी का छिड़काव ज़रूरी हैं, लेकिन कई जगह ये प्रक्रियाएं सुस्त नजर आईं।
एमसीडी पर सवाल, एनडीएमसी का तुलना में बेहतर प्रदर्शन
निरीक्षण में पाया गया कि 182 मार्ग एमसीडी के अधीन थे। चौंकाने वाली बात यह रही कि सबसे अधिक धूल वाले सभी 35 क्षेत्र एमसीडी के अधिकार क्षेत्र में आए।
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50 क्षेत्रों में मध्यम स्तर
- 70 क्षेत्रों में कम
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27 में धूल बिल्कुल नहीं
साफ है कि एमसीडी को सफाई अभियान को और तेज और प्रभावी बनाना होगा। इसके विपरीत, एनडीएमसी का प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से बेहतर रहा।
तो फिर प्रदूषण का कारण क्या है, जब पराली कम जली ?
इस बार पराली जलाने की घटनाएं कई सालों में सबसे कम रहीं। फिर भी दिल्ली की हवा क्यों बिगड़ी ? जवाब है, स्थानीय प्रदूषण का बढ़ता जाल।
सीएसई के नए विश्लेषण से चौंकाने वाली जानकारी:
59 दिनों के अध्ययन में पाया गया कि-
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22 निगरानी केंद्रों में 30 से ज्यादा दिनों तक कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) तय सीमा से ऊपर रही।
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द्वारका सेक्टर-8 में सबसे अधिक, 55 दिन
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इसके बाद जहांगीरपुरी और दिल्ली विश्वविद्यालय उत्तरी परिसर, 50 दिन
CO का लगातार बढ़ा स्तर यह साबित करता है कि वाहनों का धुआं, स्थानीय औद्योगिक स्रोत और कम हवा की गति, दिल्ली को खतरनाक प्रदूषण की गिरफ्त में बनाए हुए हैं।
दिल्ली की हवा में बढ़ते खतरे के संकेत
विश्लेषण में यह भी सामने आया कि हवा में जहरीले तत्वों के कुछ हॉटस्पॉट तेजी से उभर रहे हैं, विशेषकर घनी आबादी और भारी ट्रैफिक वाले क्षेत्र। इन इलाकों में प्रदूषण का स्तर लगातार निर्धारित सीमा से ऊपर बना हुआ है, जो कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चेतावनी है।
समाधान की राह में कई चुनौतियां
दिल्ली आज जिस स्थिति में है, वह सिर्फ सर्दी का असर नहीं, बल्कि प्रशासन, नीति और स्थानीय व्यवहार में कई कमियों का परिणाम है। पराली कम जली, लेकिन स्थानीय प्रदूषण, वाहन, धूल, उद्योग, और CO का बढ़ता स्तर, शहर की सांसें रोक रहा है।
जब तक सड़कों की सफाई व्यवस्थित नहीं होगी, वाहनों पर सख्त निगरानी नहीं बढ़ेगी और स्थानीय प्रदूषण स्रोतों पर कड़ा नियंत्रण नहीं होगा, तब तक दिल्ली की हवा हर सर्दी में यही सवाल पूछती रहेगी, “क्या मैं आपके लिए सांस हूं या ज़हर ?”
