‘प्रशासन की बुद्धि शुद्धि’ के लिए वैदिक मंत्रोच्चार
जब सुनवाई न हो तो ईश्वर की अदालत ही सही
NEWS1UP
संवाददाता
गाजियाबाद। रंगों के पर्व होली पर जहां एक ओर लोग अबीर-गुलाल से खुशियां बांट रहे हैं, वहीं राजनगर एक्सटेंशन-2 स्थित हम तुम रोड पर बसे सात सोसाइटियों के निवासियों ने कुछ अलग ही रंग चुना, आस्था, आक्रोश और आशा का रंग। मोरटा क्षेत्र स्थित आर एल मार्केट में “शासन-प्रशासन की बुद्धि शुद्धि” के लिए दिव्य एवं भव्य हवन यज्ञ का आयोजन किया गया।
यह आयोजन हम तुम रोड वेलफेयर एसोसिएशन और महक जीवन वेलफेयर ट्रस्ट के संयुक्त प्रयास से संपन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच आहुतियाँ अर्पित की गईं, कामना थी कि वर्षों से अधर में लटकी हम तुम रोड का निर्माण कार्य शीघ्र शुरू हो और क्षेत्रवासियों को सुरक्षित व सुगम आवागमन की सुविधा मिल सके।
सड़क नहीं, सवाल है संवेदनशीलता का
हम तुम रोड केवल डामर और पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी की जीवनरेखा है। दुखद तथ्य यह है कि इस मार्ग पर अब तक करीब डेढ़ दर्जन लोग सड़क हादसों में अपनी जान गंवा चुके हैं और सैकड़ों घायल हो चुके हैं। हाल ही में एक युवा की दर्दनाक मृत्यु ने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया, वह नोएडा से ड्यूटी कर रात में अपने घर लौट रहा था, लेकिन टूटी-बिखरी सड़क ने उसकी जिंदगी की राह ही रोक दी।
क्या यह विडंबना नहीं कि जिन सोसाइटियों की रजिस्ट्री हो चुकी है, जहां बैंक लोन स्वीकृत हैं, जहां अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन विधिवत गठित हैं, वहीं मूलभूत सुविधा सड़क अब भी ‘प्रतीक्षा सूची’ में है ?
यज्ञ: आस्था या प्रशासन के नाम एक व्यंग्यात्मक याचिका ?
आयोजकों ने स्पष्ट कहा कि यह हवन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि क्षेत्र के विकास और जनकल्याण की भावना का प्रतीक है। परंतु संदेश साफ है कि जब ज्ञापन, शिकायतें और निवेदन फाइलों की धूल बन जाएं, तब नागरिकों को ईश्वर की अदालत में अपील करनी पड़ती है।
शासन-प्रशासन के लिए इससे बड़ा संकेत क्या होगा कि जनता अब सड़क निर्माण के लिए मंत्रोच्चार का सहारा ले रही है ? क्या विकास की परिभाषा केवल उद्घाटन पट्टिकाओं तक सीमित रह गई है ?
सकारात्मकता के साथ तीखा प्रश्न
होली पर किया गया यह “बुद्धि शुद्धि यज्ञ” एक अनोखा और सकारात्मक विरोध है। इसमें न नारे थे, न उग्र प्रदर्शन, सिर्फ शांति, श्रद्धा और व्यवस्था से उम्मीद। लेकिन यह शांति मौन नहीं है; यह व्यवस्था से सीधा प्रश्न है-
आखिर कब तक नागरिक जान जोखिम में डालकर सफर करेंगे ?
क्या हर नई दुर्घटना के बाद ही फाइलें आगे बढ़ेंगी ?
क्या विकास का अर्थ केवल कागजों पर योजनाएं और धरातल पर गड्ढे रह गया है ?
सत्ता के लिए संदेश
यह आयोजन प्रशासन को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि आईना दिखाने के लिए था। जनता ने व्यंग्य में ही सही, पर यह स्पष्ट कर दिया कि अगर सड़कें नहीं बनेंगी तो ‘बुद्धि शुद्धि’ के यज्ञ और होंगे। अब निर्णय शासन-प्रशासन को करना है, क्या वे इस धुएं को केवल धार्मिक कर्मकांड समझकर हवा में उड़ने देंगे, या इसे जनता की आह समझकर विकास की लौ जलाएंगे ?