क्लासिक रेजीडेंसी चुनाव निरस्त: फैसले से ज्यादा सवालों के घेरे में डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय
भूमेश शर्मा
गाजियाबाद। राजनगर एक्सटेंशन स्थित क्लासिक रेजीडेंसी सोसाइटी में 5 अप्रैल 2026 को संपन्न हुए अपार्टमेंट ओनर्स एसोसिएशन (AOA) चुनाव को निरस्त करने के डिप्टी रजिस्ट्रार के आदेश ने केवल एक सोसायटी की राजनीति को ही नहीं, बल्कि सहकारी एवं आवासीय संस्थाओं से जुड़े विवादों के निस्तारण की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया को बहस के केंद्र में ला दिया है।

सोसाइटी निवासी उषा सिंह की शिकायत पर डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय द्वारा 1 जून 2026 को जारी आदेश में चुनाव को अवैध ठहराते हुए एक माह के भीतर नए चुनाव कराने का निर्देश दिया गया है। इसके लिए निदेशक, मत्स्य को निर्वाचन अधिकारी नामित किया गया है। दूसरी ओर एओए अध्यक्ष देशमणि शर्मा ने इस आदेश पर कानूनी सलाह के आगे की बाद कार्रवाई की बात कही है।
हालांकि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न चुनाव निरस्तीकरण से अधिक उस प्रशासनिक प्रक्रिया पर खड़ा हो रहा है जिसके तहत यह आदेश जारी किया गया।
तबादले के अगले दिन आदेश, संयोग या सवाल ?
गौरतलब है कि तत्कालीन डिप्टी रजिस्ट्रार वैभव कुमार के तबादले के आदेश 31 मई 2026 को जारी हुए थे, जबकि क्लासिक रेजीडेंसी प्रकरण में निर्णय 1 जून 2026 को जारी हुआ। सूत्रों के अनुसार तबादला आदेश जारी होने के बाद कई महत्वपूर्ण मामलों में भी आदेश पारित किए गए।
यहीं से सवाल उठने शुरू हो जाते हैं,
यदि सुनवाई पूरी हो चुकी थी तो कई अन्य सोसायटियों के विवाद, जिनकी सुनवाई महीनों पहले समाप्त हो चुकी थी, आज तक निर्णय की प्रतीक्षा क्यों कर रहे हैं ? क्या मामलों के निस्तारण के लिए कोई निर्धारित प्राथमिकता सूची थी ? यदि थी तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ ? और यदि नहीं थी तो किन आधारों पर कुछ मामलों को प्राथमिकता देकर आदेश जारी किए गए ? इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।
एक मामले में सख्ती, दूसरे मामलों में चुप्पी क्यों ?
क्लासिक रेजीडेंसी मामले में डिप्टी रजिस्ट्रार ने अपार्टमेंट एक्ट-2010 तथा आदर्श उपविधि-2011 की विभिन्न धाराओं का हवाला देते हुए चुनाव को अवैध माना है। आदेश के अनुसार सोसायटी का पिछला चुनाव 16 फरवरी 2025 को हुआ था और एक वर्ष की वैधानिक अवधि समाप्त होने के बाद कार्यकारिणी कालातीत हो गई थी। इसलिए रजिस्ट्रेशन एक्ट-1860 की धारा 25(2) के तहत चुनाव कराने का अधिकार डिप्टी रजिस्ट्रार को प्राप्त था।
कानूनी दृष्टि से यह तर्क अपनी जगह उचित हो सकता है, लेकिन विवाद का दूसरा पक्ष यह है कि शहर की अनेक सोसायटियों में इससे कहीं अधिक गंभीर चुनावी अनियमितताओं, सदस्यता विवादों, मतदाता सूची में गड़बड़ियों तथा मॉडल बायलॉज के खुले उल्लंघनों के आरोप वर्षों से लंबित हैं।
कई मामलों में विभागीय ऑडिट रिपोर्टों ने भी निर्वाचन प्रक्रिया में गड़बड़ी, वित्तीय अनियमितता तथा पद के दुरुपयोग जैसी गंभीर खामियों की पुष्टि की है। इसके बावजूद न तो चुनाव निरस्त किए गए और न ही दोषियों के विरुद्ध कठोर प्रशासनिक कार्रवाई सामने आई। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या कानून का अनुप्रयोग सभी मामलों में समान रूप से हो रहा है ?

क्या आदेशों में एकरूपता का अभाव है ?
सोसायटी विवादों से जुड़े कानूनी जानकारों का कहना है कि डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय के आदेशों में अक्सर एकरूपता दिखाई नहीं देती। कुछ मामलों में मॉडल बायलॉज के उल्लंघन को गंभीर मानते हुए कार्रवाई की जाती है, जबकि अन्य मामलों में समान या उससे अधिक गंभीर आरोपों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
यदि वास्तव में ऐसा है तो यह केवल एक प्रशासनिक विसंगति नहीं बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर भी प्रश्नचिह्न है। क्योंकि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।
अब अन्य मामलों के शिकायतकर्ताओं को मिली नई दलील
क्लासिक रेजीडेंसी आदेश का प्रभाव अब अन्य लंबित विवादों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। विभिन्न सोसायटियों के शिकायतकर्ता और पैरोकार इस आदेश को मिसाल बनाकर अपने मामलों में भी समान कार्रवाई की मांग करने लगे हैं।
उनका तर्क है कि यदि एक सोसायटी में कार्यकाल समाप्त होने और चुनावी प्रक्रिया में त्रुटियों के आधार पर चुनाव निरस्त किए जा सकते हैं, तो अन्य मामलों में अलग मानदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं ? यह प्रश्न आने वाले दिनों में डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
असली मुद्दा: चुनाव नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता
क्लासिक रेजीडेंसी के चुनाव निरस्तीकरण के इस पूरे प्रकरण ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है, क्या सोसायटी विवादों के निस्तारण में प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, समान और निष्पक्ष दिखाई देती है ? जब कुछ मामलों में त्वरित आदेश जारी हों, कुछ वर्षों तक लंबित रहें, कुछ में गंभीर आरोपों के बावजूद कार्रवाई न हो और कुछ में कठोर कदम उठा लिए जाएं, तब संदेह और चर्चाओं को बल मिलना स्वाभाविक है।
फिलहाल क्लासिक रेजीडेंसी का मामला एक सोसायटी का विवाद भर नहीं रह गया है। यह डिप्टी रजिस्ट्रार कार्यालय की कार्यप्रणाली, निर्णय प्रक्रिया और मामलों के निस्तारण में अपनाए जा रहे मानदंडों की निष्पक्षता की परीक्षा बन चुका है।
