लखनऊ अग्निकांड: 2016 में ध्वस्तीकरण आदेश लागू हो जाता तो क्या बच जातीं जानें ?
लखनऊ अग्निकांड ने खोली विकास प्राधिकरणों की कार्यशैली की परतें, अवैध निर्माण पर कार्रवाई से लेकर आदेश निरस्त होने तक उठे गंभीर सवाल
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
लखनऊ। प्रदेश की राजधानी के अलीगंज में सोमवार को हुए भीषण अग्निकांड ने केवल एक इमारत को नहीं झुलसाया, बल्कि उत्तर प्रदेश में विकास प्राधिकरणों की कार्यशैली, निगरानी व्यवस्था और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जिस भवन में यह दर्दनाक हादसा हुआ, उसके विरुद्ध वर्ष 2016 में अनधिकृत निर्माण के आधार पर ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया गया था। लेकिन मात्र 56 दिन बाद वही आदेश निरस्त कर दिया गया और इसके बाद भवन वर्षों तक उपयोग में बना रहा।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि वर्ष 2016 में निर्माण अवैध था तो वह वैध कैसे हो गया ? और यदि अवैध नहीं था तो ध्वस्तीकरण आदेश पारित क्यों किया गया था ?
2016 की फाइलों से निकला बड़ा सवाल
अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी मूल रूप से वर्ष 1980 में आवंटित हुआ था। बाद में स्वामित्व परिवर्तन और नामांतरण की प्रक्रियाओं के बाद वर्ष 2014 में इसका मानचित्र आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत किया गया।
इसके बावजूद लखनऊ विकास प्राधिकरण ने भवन में अनधिकृत निर्माण पाए जाने पर वर्ष 2016 में मुकदमा दर्ज किया। जांच के बाद 10 मई 2016 को विहित प्राधिकारी ने ध्वस्तीकरण आदेश पारित कर दिया। सामान्यतः ऐसा आदेश तभी पारित किया जाता है जब निर्माण नियमों के विपरीत पाया जाए।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह और भी अधिक महत्वपूर्ण है। महज दो माह से कम समय में, 5 जुलाई 2016 को ध्वस्तीकरण आदेश निरस्त कर दिया गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर ऐसा कौन-सा तथ्य सामने आया था जिसने अवैध निर्माण के विरुद्ध पारित आदेश को पलट दिया ?

हादसे के बाद शुरू हुई जवाबदेही
सोमवार को हुए अग्निकांड के बाद थाना अलीगंज में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं तथा उत्तर प्रदेश अग्निशमन सेवा अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस ने तीन आरोपियों को रामकृष्ण उपाध्याय, निवासी एमएम-232, सेक्टर-डी, अलीगंज, वीरेन्द्र प्रसाद शुक्ला, पुत्र रामेश्वर प्रसाद शुक्ला, निवासी 536/265ए, मड़ियांव/मदेयगंज, सीतापुर रोड, तुषार कृष्णा जायसवाल, पुत्र स्वर्गीय कृष्ण कुमार जायसवाल, निवासी 441 आरएन/69/3, नीलकंठ हॉस्पिटल लेन, बालागंज, थाना ठाकुरगंज को गिरफ्तार किया है जबकि अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका की जांच जारी है।
मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद बिजली विभाग, अग्निशमन विभाग तथा लखनऊ विकास प्राधिकरण के चार अधिकारियों गौरव कुमार, एक्सईएन (कलेक्शन), विद्युत विभाग, जानकीपुरम, कमलेन्द्र कुमार सिंह, एफएसएसओ, अग्निशमन विभाग, इंदिरानगर, अनिल कुमार, सहायक अभियंता (AE), लखनऊ विकास प्राधिकरण और प्रमोद पांडे, अवर अभियंता (JE), लखनऊ विकास प्राधिकरण को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। साथ ही सात दिन में रिपोर्ट देने के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया है।

केवल एक भवन नहीं, पूरे सिस्टम पर सवाल
यह मामला अब केवल एक अग्निकांड तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रश्न उत्तर प्रदेश के सभी विकास प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली से जुड़ गया है। यदि किसी भवन के विरुद्ध ध्वस्तीकरण आदेश पारित हो जाता है, तो उसकी निगरानी कौन करता है ? आदेश लागू हुआ या नहीं, इसकी जवाबदेही किसकी होती है ? यदि आदेश निरस्त होता है तो उसके कारण सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते ?
विशेषज्ञों का मानना है कि विकास प्राधिकरणों की भूमिका केवल मानचित्र स्वीकृत करने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होता है कि भवन स्वीकृत मानचित्र, अग्नि सुरक्षा मानकों और अन्य वैधानिक शर्तों का पालन कर रहा है या नहीं।

पूरे प्रदेश के लिए सबक
गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, लखनऊ और अन्य शहरों में समय-समय पर अवैध निर्माण, अग्नि सुरक्षा में लापरवाही और नियामकीय विफलताओं के मामले सामने आते रहे हैं। लेकिन अधिकांश मामलों में कार्रवाई तब तेज होती है जब कोई बड़ा हादसा हो जाता है।
अलीगंज अग्निकांड ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारी नियामक व्यवस्था हादसों को रोकने के लिए काम कर रही है, या फिर केवल हादसे होने के बाद जिम्मेदारों की तलाश में जुटती है ?
अब SIT जांच से प्रदेश की जनता केवल दोषियों के नाम नहीं, बल्कि उन प्रशासनिक निर्णयों का भी जवाब चाहती है जिनके कारण वर्ष 2016 की फाइलों में दर्ज अवैध निर्माण का मामला एक दशक बाद भी व्यवस्था के सामने अनुत्तरित प्रश्न बनकर खड़ा है।
