EV खरीदिए! लेकिन चार्ज कहां कीजिए ? हाईराइज सोसायटियों के बेसमेंट में EV चार्जर पर सबसे बड़ा नीतिगत संकट
फायर सेफ्टी पर सरकार की सख्ती, अब बेसमेंट पार्किंग में लगे निजी EV चार्जरों ने खड़े किए कई अनुत्तरित सवाल
NEWS1UP
भूमेश शर्मा
लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अग्नि सुरक्षा को लेकर जिस तरह व्यापक अभियान शुरू किया है, उसका असर पूरे प्रदेश में दिखाई दे रहा है। फायर विभाग, विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन और अन्य एजेंसियां अस्पतालों, कोचिंग संस्थानों, व्यावसायिक भवनों, मॉल और बहुमंजिला इमारतों में फायर फाइटिंग सिस्टम की जांच कर रही हैं। नियमों की अनदेखी पर नोटिस, सीलिंग और कानूनी कार्रवाई तक की जा रही है।
लेकिन इसी सख्ती के बीच एक ऐसा मुद्दा सामने आया है, जिस पर लगभग सभी विभागों के पास अधूरे जवाब तो हैं, लेकिन कोई एकीकृत व्यवस्था नहीं। यह मुद्दा है, हाईराइज आवासीय सोसायटियों के बेसमेंट में लगाए जा रहे निजी EV चार्जर।

सरकार लगातार इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दे रही है। दिल्ली सरकार ने भी बीते सोमवार को नई EV नीति को मंजूरी देते हुए इलेक्ट्रिक मोबिलिटी के विस्तार पर बड़ा जोर दिया है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जो लाखों लोग अपार्टमेंट और ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों में रहते हैं, वे अपने इलेक्ट्रिक वाहन सुरक्षित और वैधानिक रूप से चार्ज कहां करें ?
संकट का केंद्र: हाईराइज सोसायटियों के बेसमेंट

पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू हाईराइज सोसायटियों की बेसमेंट पार्किंग है। अधिकांश फ्लैट मालिक अपने निर्धारित पार्किंग स्लॉट पर निजी EV चार्जर लगवा रहे हैं। यही वह स्थान है जहां एक साथ सैकड़ों वाहन खड़े रहते हैं, बिजली की केबल, इलेक्ट्रिकल पैनल, फायर पंप और अन्य महत्वपूर्ण सेवाएं भी मौजूद रहती हैं।
ऐसी स्थिति में यदि किसी चार्जर, वायरिंग, कनेक्टर या वाहन की बैटरी में तकनीकी खराबी आती है, तो उसका असर केवल एक वाहन तक सीमित नहीं रह सकता। बंद बेसमेंट में धुआं, तापमान और बचाव कार्य की जटिलता जोखिम को और बढ़ा सकती है। यही कारण है कि अब यह विषय केवल चार्जिंग सुविधा का नहीं, बल्कि अग्नि सुरक्षा, विद्युत सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का बन चुका है।
हर विभाग के पास जवाब अधूरा

इस विषय पर फायर विभाग, विद्युत विभाग, विद्युत सुरक्षा निदेशालय, विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन के अधिकारियों से बातचीत करने पर लगभग एक जैसी तस्वीर सामने आती है। अधिकांश अधिकारी इसे AOA/RWA और निवासियों की सहमति का विषय बताते हैं।
लेकिन इसके बाद कई गंभीर प्रश्न सामने खड़े हो जाते हैं
बेसमेंट में निजी EV चार्जर लगाने की अनुमति कौन देगा ?
विद्युत लोड की स्वीकृति कौन देगा ?
वायरिंग और इंस्टॉलेशन का निरीक्षण कौन करेगा ?
अग्नि सुरक्षा मानकों का अनुपालन कौन सुनिश्चित करेगा ?
यदि भविष्य में कोई दुर्घटना होती है, तो जिम्मेदार कौन होगा ?
इन प्रश्नों का कोई स्पष्ट, समन्वित सरकारी उत्तर फिलहाल उपलब्ध नहीं है।
DM की चेतावनी के बाद AOA/RWA की बढ़ी चिंता
गाजियाबाद में जिलाधिकारी द्वारा यह स्पष्ट किए जाने के बाद कि सोसायटियों में सुरक्षा संबंधी लापरवाही से आगजनी होने पर AOA/RWA पदाधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जा सकती है, अनेक सोसायटी प्रबंधन समितियां सतर्क हो गई हैं।
कई सोसायटियों में बेसमेंट में लगे निजी EV चार्जरों की समीक्षा शुरू हुई। कुछ स्थानों पर चार्जर हटाने या वाहनों को अन्यत्र पार्क करने के नोटिस भी जारी किए गए, जिससे कई आवासीय परिसरों में विवाद की स्थिति बन गई। AOA पदाधिकारियों का कहना है कि यदि सरकार ने स्पष्ट प्रक्रिया और जिम्मेदारियां तय नहीं की हैं, तो केवल प्रबंधन समितियों पर भविष्य की जवाबदेही डालना उचित नहीं होगा।
नीति का अभाव नहीं, लेकिन ‘Policy Gap’ जरूर

यह कहना सही नहीं होगा कि EV चार्जिंग को लेकर कोई नीति ही नहीं है। केंद्र सरकार और संबंधित तकनीकी संस्थानों ने EV चार्जिंग के लिए दिशा-निर्देश और विद्युत सुरक्षा मानक जारी किए हैं। नए प्रोजेक्ट्स में EV चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।
लेकिन समस्या वहां शुरू होती है जहां पहले से बनी हजारों हाईराइज सोसायटियों के बेसमेंट में निजी चार्जिंग की बात आती है।
यहीं पर यह स्पष्ट नहीं है कि
अनुमति कौन देगा ?
निरीक्षण कौन करेगा ?
फायर ऑडिट किसके अधीन होगा ?
और
अंतिम जवाबदेही !! किसकी होगी ?
यही वह Policy Gap है, जो आज सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आ रहा है।
हरियाणा ने दिखाई दिशा, उत्तर प्रदेश के सामने भी चुनौती
दिल्ली से सटे हरियाणा ने हाल ही में अपने भवन नियमों में संशोधन कर नई आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाओं में EV चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को अनिवार्य बनाया है। संशोधित प्रावधानों में बेसमेंट और स्टिल्ट पार्किंग में EV चार्जिंग की अनुमति दी गई है, लेकिन इसे विद्युत और अग्नि सुरक्षा मानकों के अनिवार्य अनुपालन से जोड़ा गया है।
यह उदाहरण बताता है कि समाधान प्रतिबंध नहीं, बल्कि सुरक्षित नियमन (Safe Regulation) है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं ?
अग्नि सुरक्षा और विद्युत विशेषज्ञों का मानना है कि EV चार्जिंग को रोकना व्यावहारिक समाधान नहीं है।
वास्तविक आवश्यकता है
प्रमाणित चार्जिंग उपकरण
मानक वायरिंग
पर्याप्त विद्युत क्षमता
नियमित निरीक्षण
प्रभावी वेंटिलेशन
फायर सेफ्टी प्रोटोकॉल
और स्पष्ट प्रशासनिक जिम्मेदारियों की
यानी सवाल EV का नहीं, बल्कि Safe EV Infrastructure का है।
यूपी सरकार को अब क्या करना चाहिए ?
विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार को फायर विभाग, विद्युत सुरक्षा निदेशालय, ऊर्जा विभाग, डिस्कॉम, विकास प्राधिकरण, आवास विभाग और जिला प्रशासन की संयुक्त समिति बनाकर हाईराइज सोसायटियों के लिए अलग मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करनी चाहिए।
इस SOP में स्पष्ट होना चाहिए
बेसमेंट में निजी EV चार्जर लगाने की प्रक्रिया
विद्युत लोड और अलग मीटर की व्यवस्था
अनिवार्य तकनीकी एवं अग्नि सुरक्षा मानक
समय-समय पर निरीक्षण की व्यवस्था
AOA/RWA, फ्लैट मालिक, बिल्डर और विभागों की जिम्मेदारियां
दुर्घटना की स्थिति में जवाबदेही तय करने की स्पष्ट प्रक्रिया
सबसे बड़ा सवाल
आज उत्तर प्रदेश की हजारों हाईराइज सोसायटियों के बेसमेंट में हजारों निजी EV चार्जर संचालित हो रहे हैं। लेकिन इनमें से कितनों की तकनीकी जांच हुई ? कितनों का फायर रिस्क असेसमेंट हुआ ? कितने चार्जर निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप स्थापित हैं ? और यदि कल किसी बेसमेंट में चार्जिंग के दौरान कोई बड़ी दुर्घटना होती है, तो उसके लिए अंतिम रूप से जिम्मेदार कौन होगा ? इन सवालों का स्पष्ट उत्तर अभी भी सामने नहीं है।
अलीगंज अग्निकांड के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अग्नि सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। यह स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन यदि सुरक्षा व्यवस्था को वास्तव में व्यापक और भविष्य के अनुरूप बनाना है, तो हाईराइज सोसायटियों के बेसमेंट में तेजी से बढ़ रहे निजी EV चार्जरों को इस विमर्श से अलग नहीं रखा जा सकता।
सरकार यदि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को भविष्य मानती है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बहुमंजिला आवासीय परिसरों में रहने वाले लाखों नागरिकों के लिए सुरक्षित, मानकीकृत और स्पष्ट नियमों पर आधारित चार्जिंग व्यवस्था उपलब्ध हो।
अन्यथा अगली किसी दुर्घटना के बाद फिर वही सवाल उठेगा, दोषी कौन, जबकि नियम किसी के पास नहीं थे ?
